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21वी में सदी में स्वामी विवेकानंद के विचारो की प्रांसगिकता


भारत की उर्वर भूमि प्राचीन काल से ही महान रत्नों को पैदा करती रही है जिन्होंने अपने आचार-विचार से सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन किया है तथा समय-समय पर अपनी बौद्धिक श्रेश्ठता से इन रत्नों ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर आकर्षित किया है I स्वामी विवेकानंद इसी अद्वितीय ज्ञान सम्पदा से परिपूर्ण महान श्रृंखला के प्रकाश पुंज है I जिनके सिद्धांतो का पल्लवन हम आज तक करते रहे है I

वर्तमान में 21वी सदी का भारत नित्य नई समस्याओं का सामना कर रहा है I भविष्य को लेकर हमारी महत्तवाकांक्षा हमारे वर्तमान पर हावी है I आज की पीढ़ी के सामने अपने अस्तित्व को परिभाषित करने की चुनौती है, साथ ही दुनिया में जब हर मौलिक वास्तु का बाज़ारीकरण हो रहा है, तो स्वामी विवेकानंद के विचारों का महत्व हमारे लिए बहुत अधिक बढ़ जाता है I वर्तमान भौतिकवादी युग में स्वामी विवेकानंद के विचारधारा की प्रांसगिकता कई गुना बढ़ जाती है I 

स्वामी विवेकानंद के विचारो के चिर प्रासंगिकता के विषय में पंडित नेहरू ने १९५० में कहा था, "यदि आप स्वामी विवेकानंद की रचनाओं तथा व्याख्यानों को पढ़ें, तो आप उनमें एक बड़ी विचित्र बात यह पायेँगे कि वो सभी विचार पुराने नहीं लगते I यद्यपि यह बातें आज से कई वर्षो पूर्व कही गईं थी पर आज भी तरो-ताजा लगती है I इसका कारण यह है कि उन्होंने जो कुछ भी लिखा या कहा है वह हमारी अथवा विश्व कि वर्तमान समस्याओं के मूलभूत पहलुओं से सम्बंधित है I"

स्वतंत्रता प्राप्ति के ७४ वर्षो के बाद जब हम अपनी उपलब्धियों का सिंहावलोकन करते है, तो लगता है जहाँ हमने कई क्षेत्रो में यथेष्ट प्रगति कर ली है, वहीं हम मूल्यहीनता, धार्मिक असहिष्णुता, सांप्रदायिक संघर्ष, शैक्षिक अवमूल्यन आदि भयंकर रोगों के शिकार भी हो गए है, अतः हमें मार्गदर्शन की आवश्यकता है, हमें इसके लिए ऐतिहासिक दृष्टि एवं परिप्रेक्ष्य से संपन्न एक महान तथा दूरदर्शी शिल्पी की आवश्यकता है, और वह शिल्पी है " स्वामी विवेकानंद" I

आज देश में लाखों लोग भूख से मर रहे है, बच्चे कुपोषण का शिकार है गरीबी मिटाने के कई कार्यकर्मों और योजनाओं के बावजूद आज भी गरीबी बानी हुई है I ऐसे में स्वामी विवेकानंद के विचारों को अपनाया जा सकता है I स्वामी विवेकानंद ने सामाजिक कार्यो को ही भगवत प्राप्ति का मार्ग बताते हुए नर सेवा ही नारायण सेवा है, का अद्भुत ज्ञान दिया I आज जब हम खुद को समाज से विमुख कर, स्वकेन्द्रित होते जा रहे हैं, स्वार्थी होते जा रहे हैं तो उनका यह ज्ञान समाज के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता हैं I सामाजिक आयाम की इस कड़ी में उनकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि उन्होंने समाज के अभिजात्य वर्ग के लोगों को अपने से निचले वर्ग के प्रति जिम्मेदारियों का बोध करवाया I आज जब दिन-ब-दिन पूंजीवादी युग में समाज में ऊंच-नीच के खाई बढ़ती जा रही हैं, ऐसे में स्वामी जी का विचार सामाजिक समरसता को बनाये रखने का सबसे अच्छा और प्रगतिशील मार्ग हैं I स्वामी जी मानते थे कि ऐसी सामाजिक संरचना का निर्माण हो, जहां न कोई शोषक हो, न कोई शोषित I यही अवधारणा नए भारत के निर्माण को फलीभूत कर सकती है I

शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने समझाया कि प्रगतिशील भारत के निर्माण के लिए सबसे मुख्य औज़ार शिक्षा ही हैं I हमारी शिक्षा जीवन निर्माण, व्यक्तित्व निर्माण, और चरित्र निर्माण पर आधारित होना चाहिए I ऐसी शिक्षा हासिल करने वाला व्यक्ति उस व्यक्ति से अधिक शिक्षित माना जायेगा I जिसने पूरे पुस्तकालय को कंठस्थ कर लिया हो I अगर सूचनाएं ही शिक्षा होती तो फिर पुस्तकालय ही संत हो गए होते I लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को रट्टू तोता बनाने वाली हैं I जिसमें दिमाग का उपयोग नहीं किया जाता I

उन्होंने महिलाओं के लिए भी शिक्षा को मुख्य औज़ार बताया। वर्तमान में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में देश में स्थिति विकराल है। हमारे देश में महिलाए गैंगरेप, बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज प्रथा, घरेलु हिंसा जैसे अपराधों की शिकार होती रहती है, सुरक्षा के अलावा महिलाएं और भी कई मोर्चो पर समस्याओं का सामना कर रही हैं । महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग है लेकिन नख दन्त विहीन यह आयोग सिर्फ नुमाइश ही बनकर रह गया है । महिलाओं को सशक्त बनाने का हल बताते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं महिलाओं को बस शिक्षा दे दो इसके बाद में वे खुद बताएंगी कि उनके लिए किस तरह के सुधार की जरूरत है। आज जब दहेज प्रथा और बाल विवाह जैसी कई कुरीतियाँ हमारे सामने है तो शिक्षा महिलाओं के लिए सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकती हैं तथा उनको सशक्त बना सकती है। जिससे अनेक कुप्रथाओं को खत्म किया जा सकता हैं । आज जब समाज में महिलाओं के प्रति छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है तो स्वामी जी द्वारा बताए गए इस सिद्धांत को अपनाया जा सकता है कि प्रत्येक पुरुष को सिखाया जाए वो प्रत्येक स्त्री में मातृत्व को देखें। यदि प्रत्येक पुरुष स्त्री के अंदर मातृत्व या माँ के भाव को देखने लगेगा तो समाज में इस तरह की घटनाएं स्वतः ही कम हो जायेंगी।

स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषणों और लेखों द्वारा भारत की युवा पीढ़ी का आहृवान किया कि वे देश की समृद्धि विकास और कल्याण के लिए कार्य करें। युवाओं को सफलता का सूत्र देते हुए विवेकानंद जी कहते हैं कोई एक विचार लो और उसे अपनी जिंदगी बना लो उसी के बारे में सोचो और सपने में भी वही देखो। उस विचार को जियो। अपने शरीर के हर अंग को उस विचार से भर लो। सफलता का रास्ता यही है। जब तुम कोई काम कर रहे हो तो फिर किसी और चीज के बारे में मत सोचो। उन्होंने युवा पीढ़ी में मेहनत करने, तथा उन्हें अपने अंदर आत्मविश्वास और आत्मबल पैदा करने की प्रेरणा दी। युवाओं को राह दिखाते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कोई भी समाज अपराधियों की सक्रियता की वजह से गर्त में नहीं जाता बल्कि अच्छे लोगों की निष्क्रियता इसकी असली वजह है इसीलिए नायक बनो, हमेशा निडर रहो। आज के संदर्भ में युवा शक्ति का राष्ट्र के विकास में अहम योगदान माना जाता है । उनकी शिक्षा कुशलता द्वारा ही राष्ट्र की उन्नति संभव हैं। स्वामी विवेकानंद के उपरोक्त विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

स्वामी विवेकानंद ने भारत के लोगों को विश्व के अन्य देशों के ज्ञान विज्ञान व प्रगतिशील बातों को अपनाने पर बल दिया । उन्होंने भारतीयों की आलोचना की कि वे कूप मंडूक बन गए हैं बाकी दुनिया से कटकर जड़ और मृतप्रायः हो गए हैं। उनकी शिक्षा आज के संदर्भ में प्रासंगिक है। आज का दौर वैश्वीकरण का दौर है। भारतीय आज दूसरे देशों में अपनी कुशलता का लोहा मनवा रहे हैं तथा देश के अंदर भी अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

स्वामी विवेकानंद एक महान देशभक्त थे उन्होंने अपने लेखों और भाषणों से लोगों में नवीन आत्म गौरव की भावना जगाई और भारतीय संस्कृति में नया विश्वास जगाया तथा भारत के उज्जवल भविष्य के लिए कार्य किया। वर्तमान में भी राष्ट्रीय एकता तथा देश के सर्वांगीण विकास के लिए राष्ट्रभक्ति की भावना अनिवार्य हैं। आत्मविश्वास और मेहनत से ही देश तरक्की कर सकता हैं इसीलिए स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी प्रासंगिक है।






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